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Tuesday, December 23, 2014

God's grace was expressed ramlalla

रामलला के प्राकट्य की तारीख महज उत्सव ही नहीं बल्कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की दृष्टि से भी तवारीखी (ऐतिहासिक) है। वह सन् 1949 की 22-23 दिसंबर की अर्धरात्रि का ही वक्त था, जब विवादित इमारत में रामलला का प्राकट्य हुआ।

यदि हिंदू संगठनों की ओर से इसे चमत्कारिक घटना बताकर शिरोधार्य किया गया, तो बाबरी मस्जिद की वकालत करने वालों ने रामलला के प्राकट्य को साजिशपूर्ण बताया एवं बाबरी मस्जिद स्वतंत्र कराने की मांग जारी रखी। गत 66 वर्षों से इसी तारीख को राम प्राकट्योत्सव का आयोजन करती आई रामजन्मभूमि सेवा समिति का गठन प्राकट्य की तारीख के कुछ ही दिन बाद किया गया और वे सेवा समिति के महामंत्री गोपाल सिंह विशारद ही थे, जिन्होंने सन् 1950 में पहला वाद दायर करते हुए विवादित इमारत में कथित रूप से प्रकट हुए रामलला की पूजा-अर्चना की इजाजत मांगी, तो दूसरे पक्ष ने इस मांग का प्रतिवाद किया। इसी वर्ष ही रामचंद्रदास परमहंस ने श्रद्धालुओं के लिए रामलला के दर्शन की इजाजत मांगी।

परस्पर विरोधी दावेदारी का परिणाम यह हुआ कि प्रशासन ने विवादित इमारत को कुर्क कर लिया। हालांकि यदि निर्मोही अखाड़ा के पंच पुजारी रामदास की मानें तो निर्मोही अखाड़ा बाबर के पूर्व से ही रामजन्मभूमि का प्रबंध करती आ रही थी और बाबर के सेनापति द्वारा मंदिर तोड़े जाने के समय भी रामजन्मभूमि का प्रबंधन निर्मोही अखाड़ा की ही देख-रेख में था और रामजन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिए निर्मोही अखाड़ा ने भरपूर प्रयास किया। विवाद के चलते ही एक दौर ऐसा आया जब रामलला की मूर्ति वहां से हटाकर फैजाबाद स्थित गुप्तारगढ़ी में संरक्षित की गई। निर्मोही अखाड़ा के साधु प्रत्येक सुबह रामलला की मूर्ति को हाथी पर रखकर रामजन्मभूमि तक ले जाते थे और पूरे दिन पूजा अर्चना के बाद सायं वापस गुप्तारगढ़ी पर ले आते थे। यह विडंबना अकबर के दरबार तक पहुंची और अकबर ने विवादित इमारत के सम्मुख रामचबूतरा पर रामलला को स्थाई रूप से विराजमान कर वहां पूजन-अर्चन की इजाजत दी। इसी के बाद से यदि रामचबूतरा पर रामलला की पूजा शुरू हुई, तो गर्भगृह के लिए लड़ाई भी जारी रही। 

Monday, December 22, 2014

66th Ram Praktyotsv: Pitcher of the deity was assigned to adorer

सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन रामजन्मभूमि के वाद में रामजन्मभूमि सेवा समिति पुन: पार्टी बनना चाहती है। यह जानकारी सेवा समिति के महामंत्री रामप्रसाद मिश्र ने दी। उन्होंने बताया कि जिन राजेंद्र सिंह विशारद ने इस वाद में सेवा समिति के प्रतिनिधि की हैसियत से रामलला के सखा का समर्थन किया था, उन्हें इसका हक ही नहीं था। वे यह वाद दाखिल करने वाले गोपाल सिंह विशारद के पुत्र तो थे पर यह वाद गोपाल सिंह विशारद का वैयक्तिक न होकर सेवा समिति के महामंत्री की हैसियत से था और सेवा समिति का सामूहिक निर्णय आज भी इस वाद में किसी का समर्थन न कर स्वयं पार्टी बने रहने का है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि रामजन्मभूमि मामले की प्रथम वादी सेवा समिति ही थी।

66वें राम प्राकट्योत्सव के उपलक्ष्य में रामजन्मभूमि सेवा समिति की ओर से रंगमहल बैरियर पर रामलला के अर्चक अशोकदास को रामजन्मभूमि सेवा समिति की ओर से पूर्वाह्न कलश सौंपा गया। कलश सौंपने वालों में सेवा समिति के महामंत्री रामप्रसाद मिश्र, संयोजक संजय शुक्ल, उपाध्यक्ष रामभद्र पाठक, मंत्री हरिशंकर सिंह, गोपीनाथ शुक्ल, रामप्रसाद यादव आदि रहे। इस मौके पर सेवा समिति के पदाधिकारियों के साथ नगर पालिकाध्यक्ष राधेश्याम गुप्त एवं सभासद ङ्क्षपटू मांझी भी रहे। समिति के पदाधिकारी बुधवार को रामलला के अर्चक से कलश वापस लेकर शोभायात्रा निकालेंगे। वह 22-23 दिसंबर सन् 1949 की अर्धरात्रि थी, जब विवादित रामजन्मभूमि पर रामलला के प्राकट्य का दावा किया गया। प्रति वर्ष इसी तारीख को ध्यान में रखकर रामजन्मभूमि सेवा समिति की ओर से राम प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। छह दिसंबर 1992 को ढांचा ध्वंस से पूर्व तक प्राकट्योत्सव का केंद्र रामलला का गर्भगृह होता रहा पर उसके बाद से प्राकट्योत्सव के आयोजन में गतिरोध आ गया। यद्यपि पूर्व की तरह प्राकट्योत्सव के उपलक्ष्य में शोभायात्रा निकलने की परंपरा बदस्तूर है पर गर्भगृह में पूजन की परंपरा संक्रामित हुई। जहां पूर्व में सेवा समिति के पदाधिकारी गर्भगृह में जाकर प्राकट्योत्सव के कलश का पूजन करते रहे, वहीं बाद में समिति के पदाधिकारी तो रोक दिए गए पर कलश गर्भगृह में ले जाया जाता रहा। 17 अक्टूबर 2002 को विहिप की अगली कतार के तीन दर्जन से अधिक नेताओं के जबरन गर्भगृह के करीब तक प्रवेश कर जाने के बाद से अदालती आदेश का अनुपालन सख्त हुआ और उसी के परिणामस्वरूप राम प्राकट्योत्सव का कलश भी गर्भगृह तक पहुंचना प्रतिबंधित हो गया। हालांकि सेवा समिति के महामंत्री ने विश्वास जताया कि उन्होंने रामलला के अर्चक को प्राकट्योत्सव का कलश सौंपा है और वह गर्भगृह में रखा जाएगा।

Wednesday, December 17, 2014

Police evacuated the statue stolen in Raghunathji

अधिष्ठाता श्री रघुनाथ जी की मूर्ति को चोरी हुए एक सप्ताह बीत गया लेकिन पुलिस के हाथ अभी तक खाली हैं। पुलिस का कहना है कि मूर्ति चोरी मामले में विभिन्न राज्यों में लगभग छह पुलिस टीमों को भेजा गया है। पूर्व में ऐसी वारदातों से जुड़े कुछ शातिर पुलिस के निशाने पर हैं। विभिन्न राज्यों में रह रहे इन शातिरों से भी पुलिस पूछताछ करेगी।

आइजी मध्य रेंज पीएल ठाकुर ने पुष्टि करते हुए कहा कि पुलिस की कुछ टीमों को अन्य राज्यों में भेजा गया है। कुल्लू में राष्ट्रीय राजमार्ग-21 वामतट मार्ग, संपर्क मार्गो व ट्रैकिंग रूटों पर पहले ही पहरा बिठा दिया गया है। पुलिस सूत्रों की मानें तो चार सदस्यीय एक टीम पुणो रवाना की गई है। वारदात के एक सप्ताह बाद भी श्री रघुनाथ जी की त्रेता युगकालीन मूर्ति समेत अन्य मूर्तियों का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। पिछले सप्ताह सोमवार की रात घटी इस घटना ने रघुनाथ जी के भक्तों को सांसत में डाल रखा है। वारदात के तीन दिन बाद हालांकि पुलिस ने जिला बस अड्डे पर लगे सीसीटीवी कैमरों में तीन संदिग्धों के दिखने का भी दावा किया है लेकिन वे भी पुलिस की पहुंच से बहुत दूर हैं। पता चला है कि सोमवार देर सायं पुलिस की एक टीम ने मंडी जिले के साथ लगते नगवाईं में भी दबिश दी थी लेकिन उसे वहां कुछ नहीं मिला। वहीं इंटरपोल इमीग्रेशन कार्यालयों (दूतावासों) सीआइएसएफ, एसएसबी व आरपीएफ से भी हिमाचल पुलिस संपर्क में है। इनके माध्यम से पुलिस विदेशों से आने वाले तथा विदेशों को जाने वाले लोगों, इंडो-नेपाल बार्डर तथा अन्य सीमाओं, हवाई अड्डों व रेलवे स्टेशनों पर नजर रखे हुए है। इस पूरे मामले को देख रहे अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कानून एवं व्यवस्था संजय कुंडू भी मंडी में डटे हुए हैं।

कुंडू के निर्देशों पर ही प्रदेश पुलिस इस मामले पर काम कर रही है। आइजी मध्य रेंज पीएल ठाकुर ने कहा कि पुलिस अपना काम कर रही है और टीमों को रवाना कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक भी दो दिन से मंडी में हैं।

अधिष्ठाता रघुनाथ जी की त्रेता युगकालीन मूर्ति को ढूंढने के लिए पुलिस खूब हाथ-पांव मार रही है। पुलिस ने लगभग 24 पुलिसकर्मियों की एक टीम का गठन किया है। टीम में छह महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं। टीम के सदस्य सादी वेशभूषा में आम लोगों के बीच घूमेंगे और चोरी संबंधी सुराग ढूंढेंगे। पुलिस को शक है कि रघुनाथ जी की मूर्ति तथा चोरीशुदा अन्य मूर्तियां अभी कुल्लू जिला में ही हैं। बर्फबारी का फायदा उठा कर शातिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी इन मूर्तियों को चोरी छिपे ले जाकर प्रदेश से बाहर ठिकाने लगा सकते हैं। इस बिंदू पर भी पुलिस की जांच केंद्रित हैं। मंडी, बिलासपुर व राष्ट्रीय राजमार्ग-20 व 21 पर भी पहरा बिठाया हुआ है। आइजी मध्य रेंज पीएल ठाकुर ने कहा कि पुलिस किसी भी बिंदू पर कोई ढील नहीं बरतना चाहती। पुलिस टीम अपना काम कर रही है।

Raghunath Temple released footage of the three suspects in theft

कुल्लू के ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर में चोरी के मामले में पुलिस ने शहर में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों से एकत्र तीन संदिग्धों की फुटेज जारी की है। पुलिस ने बुधवार को कुल्लू जिला मुख्यालय समेत आस-पास के इलाकों में भी दबिश दी। इस दौरान कुछ घरों व भूतनाथ मंदिर के पास बाजार में भी जांच की। पुलिस मध्य क्षेत्र मंडी के महानिरीक्षक पीएल ठाकुर ने रघुनाथ मंदिर में चोरी के मामले में हुई प्रगति के बारे में जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि कुल्लू शहर में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों की छानबीन के बाद तीन संदिग्धों की पहचान की गई है, जो नौ दिसंबर को सुबह बस अड्डा से सरवरी के बीच देखे गए हैं। इनकी आयु 20 से 27 वर्ष के बीच है। संदिग्धों के बारे में किसी तरह की पुख्ता जानकारी देकर इन्हें पकडऩे पर प्रदेश सरकार ने 10 लाख रुपये पुरस्कार राशि देने की घोषणा की है। उधर, देव कारकूनों ने रघुनाथ जी के मंदिर में पूछ डाली (भविष्यवाणी) व मूर्ति के जमीन के नीचे दबे होने की बात उठी है। देव कारकूनों के कहने पर पुलिस ने उस स्थान पर मेटल डिटेक्टर से भी खोज अभियान चलाया है। पुलिस की एक टीम भी मंडी में ही बिठा दी गई है। इधर, कुल्लू जिला पुलिस व विशेष जांच टीम भी अपने स्तर पर काम कर रही है। पुलिस मामले में इंटरपोल, दूतावासों, सीआइएसएफ, आरपीएफ व एसएसबी समेत कई एजेंसियों की भी मदद ले रही है। पुलिस ने विभिन्न राज्यों में भी कुछ टीमें रवाना की गई हैं। अभी छानबीन चल रही है। हर पहलु की गहनता से जांच की जा रही है। जल्द ही आरोपी गिरफ्तार होंगे।

Tuesday, December 16, 2014

Llyhan priest's secret basement

मंडी जिला के देवी-देवता अकूत संपत्ति के मालिक हैं। जिला में ऐसे भी देवता हैं जिनके आज भी अपने तहखाने हैं। इन तहखानों में कितनी धन-दौलत है, किसी को आज तक पता नहीं चल पाया है। मंदिर के पुजारी नए पुजारी के कान में तहखाने के खजाने की जानकारी देते हैं।

कुल्लू में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति की तर्ज पर अगर दुर्भाग्यवश चोर वारदात को अंजाम देते हैं तो चोर कितनी धन-दौलत ले उड़े, शायद इसका पता तक नहीं चलेगा। मंडी जिला में आज भी ऐसे मंदिर हैं जिनका ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से महत्व है। सदियों पुराने मंदिर आज भी रियासतकाल की यादों को ताजा करते हैं। इनमें से सुकेत रियासत के करसोग में स्थित ममलेश्वर महादेव, देवी कामाक्षा, देव माहूनाग, देव बड़ायोगी शामिल हैं। पराशर में पराशर ऋषि का मंदिर भी सदियों पुराना इतिहास समेटे हुए है।

ममेल में स्थित ममलेश्वर महादेव के मंदिर में आज भी ऐसी वस्तुएं मौजूद हैं जो महाभारतकालीन या फिर उससे पहले से संबंध रखती हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में ऐसा तहखाना आज भी मौजूद है जिसमें रखी धन-दौलत के बारे में पुजारी के अलावा कोई और नहीं जानता है। देव समाज से जुड़े लोगों में अब ऐसे देवी-देवताओं की संपत्ति के बारे में असुरक्षा की भावना प्रबल होने लगी है।

देव समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसे देवी-देवताओं की संपत्ति को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि आम लोगों को भी देवता की संपत्ति के बारे में पता चल सके। भविष्य में अगर दुर्भाग्यवश ऐसे मंदिरों में चोरी की वारदात को अंजाम देते हैं तो चुराई गई दौलत का आकलन तक करना मुश्किल होगा। मंदिरों की सुरक्षा के लिए भी प्रशासन से पुख्ता प्रबंध करने की देवसमाज के लोगों ने गुहार लगाई है।

इधर, मंडी जिला सर्व देवता कमेटी के प्रधान शिवपाल शर्मा ने प्रदेश सरकार से मंदिरों की सुरक्षा को लेकर कड़े सुरक्षा इंतजाम करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जिला में ऐसे भी देवी देवता है जिनकी संपत्ति करोड़ों में है।

अधिष्ठाता रघुनाथ जी चोरी हुई त्रेता युगकालीन मूर्ति तथा अन्य मूर्तियों का अभी तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। वारदात को लेकर घाटी में लोग भी खूब चर्चा कर रहे हैं लेकिन दूसरी ओर पुलिस के हाथ बिल्कुल खाली हैं।

पुलिस सीसीटीवी में तीन संदिग्धों का दावा करने के बाद अभी तक आगे कुछ नहीं कर सकी है। पुलिस ने राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर बजौरा में लेफ्ट बैंक मार्ग पर तथा अन्य संपर्क मार्गो पर नाकाबंदी कर रखी है। हालांकि जिले में हुए भारी हिमपात ने भी मंदिर से मूर्तियां चुराने वाले शातिरों को ढूंढ रही पुलिस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पुलिस का कहना है कि जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही। कुल्लू पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र वर्मा ने बताया कि पुलिस अपना काम कर रही है तथा अन्य एजेंसियों से पुलिस लगातार संपर्क में हैं। उन्होंने कहा कि जल्द मामले का पटाक्षेप होगा।

After a week's clue Raghunathji

अधिष्ठाता श्री रघुनाथ जी की मूर्ति को चोरी हुए एक सप्ताह

का बीत चुका गया है, लेकिन पुलिस अब तक रघुनाथ जी तथा अन्य चोरी हुई मूर्तियों को नहीं ढूंढ सकी है। वारदात को अंजाम देने वाले शातिर अब भी पुलिस की पहुंच से दूर है।

पुलिस ने कुल्लू जिला के ट्रैकिंग रूटों और संपर्क मार्गो पर भी पहरा बैठा दिया है।

राष्ट्रीय राजमार्ग 21 पर बंजौरा के समीप तथा वामतट मार्ग पर भी नाकाबंदी की गई है। एक सप्ताह से चली आ रही पुलिस की कसरत अभी तक कोई रंग नहीं दिखा पाई है।

हालांकि चार दिन पहले पुलिस ने जिला बस अड्डे पर लगे तीन सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में तीन संदिग्धों के दिखने का दावा किया है। लेकिन, ये संदिग्ध किस राज्य के हैं और इनका पता ठिकाना क्या है। यह भी पुलिस को अभी तक मालूम नहीं है। स्टेट सीआइडी हैडक्वाटर के माध्यम से पुलिस इंटरपोल और इमिक्रेशन कार्यालयों (दूतावास) के संपर्क में है। एसएसबी, सीआईएसएफ, आरबीएफ के माध्यम से भी पुलिस इंडो नेपाल बार्डर समेत अन्य सीमाओं हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर भी नजर रखे हुए है। प्रदेश सरकार ने रघुनाथ जी की

मूर्ति का सुराग देने वाले को पहले ही दस लाख रुपये तथा विश्व ङ्क्षहदू परिषद ने दो लाख रुपये इनाम के भी घोषणा कर रखी है।

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कानून एवं व्यवस्था संजय कुंडू के दिशा निर्देशों पर

कुल्लू जिला पुलिस और विशेष जांच टीम काम कर रही है। कुल्लू के पुलिस अधीक्षक सुरेंद्र वर्मा ने कहा कि सभी मार्गो समेत ट्रैकिंग रूटों पर भी पुलिस की नजर है।

ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर कुल्लू से भगवान रघुनाथ की मूर्ति चोरी होने के बाद

बिलासपुर जिला पुलिस अलर्ट है। पुलिस ने सोमवार को स्वारघाट में प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों के वाहनों की जांच की। हालांकि इस दौरान भगवान रघुनाथ की मूर्ति का सुराग नहीं लग पाया है। स्वारघाट पुलिस ने मूर्ति की तलाश के लिए कई जगह नाके लगाए हैं। दिन-रात वाहनों की जांच की जा रही है।

इसके अलावा हर व्यक्ति की गतिविधियों पर पुलिस की नजर है। पुलिस करीब तीन हजार वाहनों की जांच कर चुकी है लेकिन कोई सुराग नहीं मिला है। स्वारघाट के थाना प्रभारी कर्म ङ्क्षसह ने बताया कि हर वाहन का निरीक्षण किया जा रहा है। 

Monday, December 15, 2014

As the woman is a Hanuman temple worship

आपको सुनकर आश्चर्य लगेगा, लेकिन दुनिया में एक मंदिर ऐसा भी है जहां हनुमान पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के वेश में नजर आते हैं। यह प्राचीन मंदिर बिलासपुर के पास है। हनुमानजी के स्त्री वेश में आने की यह कथा कोई सौ दौ सौ नहीं बल्कि दस हजार साल पुरानी मानी जाती है।

बिलासपुर से 25 कि. मी. दूर एक स्थान है रतनपुर। इसे महामाया नगरी भी कहते हैं। यह देवस्थान पूरे भारत में सबसे अलग है। इसकी मुख्य वजह मां महामाया देवी और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है। खास बात यह है कि विश्व में हनुमान जी का यह अकेला ऐसा मंदिर है जहां हनुमान नारी स्वरूप में हैं। इस दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू ने करवाया था निर्माण-

पौराणिक और एतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस देवस्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि यह लगभग दस हजार वर्ष पुराना है। एक दिन रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू क़ा ध्यान अपनी शारीरिक अस्वस्थता की ओर गया। वे विचार करने लगे-मैं इतना बडा राजा हूं मगर किसी काम का नहीं। मुझे कोढ़ का रोग हो गया है। अनेक इलाज करवाया पर कोई दवा काम नहीं आई। इस रोग के रहते न मैं किसी को स्पर्श कर सकता हूं। न ही किसी के साथ रमण कर सकता हूं, इस त्रास भरे जीवन से मर जाना अच्छा है। सोचते सोचते राजा को नींद आ गयी।

राजा ने सपने में देखा कि संकटमोचन हनुमान जी उनके सामने हैं, भेष देवी सा है, पर देवी है नहीं, लंगूर हैं पर पूंछ नहीं जिनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली है तो दूसरे हाथ में राम मुद्रा अंकित है। कानों में भव्य कुंडल हैं। माथे पर सुंदर मुकुट माला। अष्ट सिंगार से युक्त हनुमान जी की दिव्य मंगलमयी मूर्ति ने राजा से एक बात कही। हनुमानजी ने राजा से कहा कि हे राजन् मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। तू मंदिर का निर्माण करवा कर उसमें मुझे बैठा। मंदिर के पीछे तालाब खुदवाकर उसमें स्नान कर और मेरी विधिवत् पूजा कर। इससे तुम्हारे शरीर में हुए कोढ़ का नाश हो जाएगा। इसके बाद राजा ने विद्धानों से सलाह ली। उन्होंने राजा को मंदिर बनाने की सलाह दी। राजा ने गिरजाबन्ध में मंदिर बनवाया। जब मंदिर पूरा हुआ तो राजा ने सोचा मूर्ति कहां से लायी जाए। एक रात स्वप्न में फिर हनुमान जी आए और कहा मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है। तू कुण्ड से उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित करवा। दूसरे दिन राजा अपने परिजनों और पुरोहितों को साथ देवी महामाया के दरबार में गए। वहां राजा व उनके साथ गए लोगों ने कुण्ड में मूर्ति की तलाश की पर उन्हें मूर्ति नहीं मिली। हताश हो राजा महल में लौट आए।

संध्या आरती पूजन कर विश्राम करने लगे। मन बैचेन हनुमान जी के दर्शन देकर कुण्ड से मूर्ति लाकर मंदिर में स्थापित करने को कहा है। और कुण्ड में मूर्ति मिली नहीं इसी उधेड़ बुन में राजा को नींद आ गई। नींद का झोंका आते ही सपने में फिर हनुमान जी आ गए और करने लगे- राजा तू हताश न हो मैं वहीं हूं तूने ठीक से तलाश नहीं किया। जाकर वहां घाट में देखो जहां लोग पानी लेते हैं, स्नान करते हैं उसी में मेरी मूर्ति पड़ी हुई है। राजा ने दूसरे दिन जाकर देखा तो सचमुच वह अदभुत मूर्ति उनको घाट में मिल गई। यह वही मूर्ति थी जिसे राजा ने स्वप्न में देखा था। जिसके अंग प्रत्यंग से तेज पुंज की छटा निकल रही थी। अष्ट सिंगार से युक्त मूर्ति के बायें कंधे पर श्री राम लला और दायें पर अनुज लक्ष्मण के स्वरूप विराजमान, दोनों पैरों में निशाचरों दो दबाये हुए। इस अदभुत मूर्ति को देखकर राजा मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए। फिर विधिविधान पूर्वक मूर्ति को मंदिर में लाकर प्रतिष्ठित कर दी और मंदिर के पीछे तालाब खुदवाया जिसका नाम गिरजाबंद रख दिया। मनवांछित फल पाकर राजा ने हनुमान जी से वरदान मांगा कि हे प्रभु, जो यहां दर्शन करने को आये उसका सभी मनोरथ सफल हो। इस तरह राजा प्रृथ्वी देवजू द्वारा बनवाया यह मंदिर भक्तों के कष्ट निवारण का एसा केंद्र हो गया, जहां के प्रति ये आम धारणा है कि हनुमान जी का यह स्वरूप राजा के ही नहीं प्रजा के कष्ट भी दूर करने के लिए स्वयं हनुमानी महाराज ने राजा को प्रेरित करके बनवाया है।

दक्षिण मुखी हनुमान जी की मूर्ति में पाताल लोक का चित्रण हैं। रावण के पुत्र अहिरावण का संहार करते हुए उनके बाएं पैर के नीचे अहिरावण और दाये पैर के नीचे कसाई दबा है। हनुमान जी के कंधों पर भगवान राम और लक्ष्मण को बैठाया है। एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में लड्डू से भरी थाली है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 84 किलोमीटर दूर रमई पाट में भी एक ऐसी ही हनुमान प्रतिमा है। 

Do you know there are married Hanuman Brhmchari

हनुमान जी के बारे में माना जाता है की वो बाल ब्रह्मचारी है। पर भारत के कुछ हिस्सों खासकर तेलंगाना में हनुमान जी को विवाहित माना जाता है। इन क्षेत्रों में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार हनुमानजी की पत्नी का नाम सुवर्चला है और वे सूर्य देव की पुत्री हैं। यहां पर हनुमानजी और सुवर्चला का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। इसके अलावा पाराशर संहिता में भी हनुमान जी और सुवर्चला के विवाह की कथा है।

हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर तेलंगाना के खम्मम जिले में है यह एक प्राचीन मंदिर है। यहां हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा विराजमान है। यहां की मान्यता है कि जो भी हनुमानजी और उनकी पत्नी के दर्शन करता है, उन भक्तों के वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है।

खमम जिला हैदराबाद से करीब 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अत: यहां पहुंचने के लिए हैदराबाद से आवागमन के उचित साधन मिल सकते हैं। हैदराबाद पहुंचने के लिए देश के सभी बड़े शहरों से बस, ट्रेन और हवाई जहाज की सुविधा आसानी से मिल जाती है।

हनुमान जी के विवाह सम्बन्धी पौराणिक कथा-

तेलंगाना के खम्मम जिले में प्रचलित मान्यता का आधार पाराशर संहिता को माना गया है। पाराशर संहिता में उल्लेख मिलता है कि हनुमानजी अविवाहित नहीं, विवाहित हैं। उनका विवाह सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से हुआ है। संहिता के अनुसार हनुमानजी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देव के पास 9 दिव्य विद्याएं थीं। इन सभी विद्याओं का ज्ञान बजरंग बली प्राप्त करना चाहते थे। सूर्य देव ने इन 9 में से 5 विद्याओं का ज्ञान तो हनुमानजी को दे दिया, लेकिन शेष 4 विद्याओं के लिए सूर्य के समक्ष एक संकट खड़ा हो गया।

शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान सिर्फ उन्हीं शिष्यों को दिया जा सकता था जो विवाहित हों। हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे, इस कारण सूर्य देव उन्हें शेष चार विद्याओं का ज्ञान देने में असमर्थ हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए सूर्य देव ने हनुमानजी से विवाह करने की बात कही। पहले तो हनुमानजी विवाह के लिए राजी नहीं हुए, लेकिन उन्हें शेष 4 विद्याओं का ज्ञान पाना ही था। इस कारण अंतत: हनुमानजी ने विवाह के लिए हां कर दी।

जब हनुमानजी विवाह के लिए मान गए तब उनके योग्य कन्या की तलाश की गई और यह तलाश खत्म हुई सूर्य देव की पुत्री सुवर्चला पर। सूर्य देव ने हनुमानजी से कहा कि सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी है और इसका तेज तुम ही सहन कर सकते हो। सुवर्चला से विवाह के बाद तुम इस योग्य हो जाओगे कि शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सको। सूर्य देव ने यह भी बताया कि सुवर्चला से विवाह के बाद भी तुम सदैव बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे, क्योंकि विवाह के बाद सुवर्चला पुन: तपस्या में लीन हो जाएगी।

यह सब बातें जानने के बाद हनुमानजी और सुवर्चला का विवाह सूर्य देव ने करवा दिया। विवाह के बाद सुवर्चला तपस्या में लीन हो गईं और हनुमानजी से अपने गुरु सूर्य देव से शेष 4 विद्याओं का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया। इस प्रकार विवाह के बाद भी हनुमानजी ब्रह्मचारी बने हुए हैं।

It was the time of sacrifice that the stolen statue of Ram Ashwamedha

कुलूत प्रदेश के दिवंगत राजा जगत सिंह को जब कुष्ठ रोग ने घेरा तो इस रोग से पार पाने के लिए अयोध्या से रघुनाथ जी को कुल्लू लाया गया। 1672 में अयोध्या से भगवान रघुनाथ व माता सीता की मूर्तियां कुल्लू पहुंचते ही राजा जगत सिंह रोगमुक्त हो गए। कल चोरी हुई रघुनाथ जी की मूर्ति की और भी है अद्भूत बातें-

हालांकि मूर्ति के 1657 के आसपास कुल्लू लाए जाने की भी बाते होती रही हैं, लेकिन कुलूत राज परिवार भी रघुनाथ जी के 1672 में ही कुल्लू पहुंचने की पुष्टि कर रहा है। बताया जाता है कि राजा जगत सिंह को रोगी हालत में देखकर भुंतर क्षेत्र में रहने वाले एक पयहारी बाबा ने ही सलाह दी थी कि वे अयोध्या से रघुनाथ व सीता माता की मूर्तियां लेकर आएं तो ही वे रोगमुक्त हो सकेंगे। इस पर अयोध्या से यह मूर्तियां लाई गईं और उसके बाद रघुनाथ कुल्लू में रहने लगे। रघुनाथ जी को समर्पित कुल्लू दशहरा उत्सव भी 1672 से शुरू हुआ। इस मूर्ति को कुल्लू लाए जाने की नौबत क्यों आई, इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है।

बताया जाता है कि किसी ने राजा जगत सिंह के पास झूठी शिकायत की थी कि मणिकर्ण घाटी के टिपरी गांव के ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास चारपथा (करीब पांच किलोग्राम) मोती हैं। इस पर राजा ने आदेश जारी करते हुए ब्राह्मण को कहा कि मैं मणिकर्ण जा रहा हूं, लौटते समय वह मोती मुङो दिखाना। वास्तव में दुर्गादत्त के पास मोती थे ही नहीं। जब ब्राह्मण दुर्गादत्त को पता चला कि राजा मणिकर्ण से लौट रहे हैं तो दुर्गादत्त ने अपने परिवार को घर में कैद किया और घर को आग लगा दी। स्वयं को भी इन्हीं लपटों के हवाले कर दिया। इसके बाद से ही राजा को रोग ने घेरा और इससे पार पाने के लिए अयोध्या से रघुनाथ जी कुल्लू लाए गए। कुछ के लोग मूर्ति को कुल्लू लाए जाने की घटना को एक खास रणनीति से भी जोड़ते हैं। दुर्गादत्त तथा उसके परिवार के प्राण त्यागने के बाद कुलूत राजपरिवार टिपरी गांव नहीं गया। इस घटना के लगभग 340 साल बाद 2011 में टिपरी गांव में दोष मिटाने के लिए कारी छिद्रा नामक यज्ञ हुआ। इस यज्ञ के बाद से ही राज परिवार के सदस्य टिपरी गांव में जा रहे हैं।

इतिहास-16ब्राह्मण की मृत्यु के बाद राजा जगत सिंह हुए थे बीमार

हिमाचल प्रदेश और कुलूत, एनसाईक्लोपीडिया ऑफ कुलूत तथा कुलूती हिंदू व्याकरण के लेखक दयानंद सारस्वत कहते हैं कि रघुनाथ मंदिर से चोरी हुई मूर्ति त्रेता युग की है। यह मूर्ति भगवान श्रीराम चंद्र द्वारा अश्वमेध यज्ञ के समय स्वयं तैयार की गई थी क्योंकि माता सीता उस समय वनवास पर थी। अश्वमेध यज्ञ की पूर्णता के लिए पति पत्नी दोनों को यज्ञ में उपस्थित होना आवश्यक था। सीता की गैर मौजूदगी के कारण श्रीराम व सीता दोनों की यह मूर्तियां तैयार करवाई गई। राजा जगत सिंह ने यह मूर्तियां अयोध्या से कुल्लू लाईं। दूसरी ओर यह भी बताते चलें कि इस बिंदू पर भी कई विद्वानों में बहस होती रही है कि अयोध्या में श्रीराम चंद्र नहीं बल्कि राम लला (बाल राम चंद्र) की मूर्ति है। विद्वान इस पर यह भी बहस करते रहे हैं कि राम चंद्र व सीता की आदिकालीन मूर्तियां कुल्लू में हैं या अयोध्या में हैं। दयानंद सारस्वत, किशोर ठाकुर, प्रताप सिंह ठाकुर आदि कहते हैं कि चोरी की यह वारदात कोई आम नहीं है। यह करोड़ों सनातनियों की आस्था के प्रतीक श्रीराम चंद्र जी से जुड़ा मामला है। इस मामले को प्रशासन और सरकारें अति गंभीरता से लें।