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Monday, February 23, 2015

These four things are the big things

एक साधु थे। उनसे शिक्षा लेने के लिए बहुत से स्त्री पुरुष आते थे। साधु उन्हें बड़ी ही उपयोगी बातें बताया करते थे। एक दिन उन्होंने कहा, 'तुम लोग चार बातें याद रखो तो जीवन का आनंद ले सकते हो।'

लोगों ने पूछा, 'स्वामी जी, वे चार बातें क्या हैं ?'

स्वामीजी बोले, पहली बातः तुम जहां भी रहो, अपने को आवश्यक बना दो। इतना काम करो कि लोग समझें कि अगर तुम चले गए तो उनका काम रुक जाएगा। कहने का आशय यह है कि तुम किसी पर बोझ मत बनो, बल्कि दूसरों के बोझ को हल्का करो।

दूसरी बातः स्वयं को स्वस्‍थ रखो। काम करने के लिए शरीर को तंदुरुस्त ऱखना आवश्यक है।

तीसरी बातः आलस्य को अपने पास कभी भी भटकने मत दो। जो आदमी आलस्‍य करता है। वह निकम्मा हो जाता है।

और आखिर में चौथी बात ये कि, एक-एक पैसे का उपयोग करो। याद रखो, तुम्हें जो पैसा मिला है, 'वह भगवान का दिया हुआ है, और भगवान की दी हुई चीज का किसी भी तरह से दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।'

Tuesday, February 3, 2015

Seven lives this day to get salvation bath

इस वर्ष माघ पूर्णिमा 3 फरवरी को है। इस दिन पुष्प नक्षत्र और रवि योग भी बन रहा है और इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण दिन बन जाता है। पद्म पुराण और भविष्यपुराण में वर्णन है कि इस दिन संगम में स्नान करने से सात जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है।

माघ के पूरे मास में ही नदियों और जलाशयों के जल में प्रात:काल स्नान से मन की शांति प्राप्त होती है और माघ पूर्णिमा इस पूरे शुभ मास के समापन की तिथि है। इस दिन नदियों के किनारे लोग सूर्य को अर्घ्‍य देते हैं और विधि विधान से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं। माघ इस तरह से ध्यान, तप, व्रत और संयम का माह है।

इसी मास में लोग कल्पवास भी करते हैं। माघ मास में कल्पवास करके पूर्णिमा पर उसकी विधिवत समापन करने वाला जन्म और मृत्यु के फेर से मुक्त हो जाता है। हमारे शास्त्रों ने इस दिन स्नान और दान की अत्यधिक महत्ता बताई गई है। यह ऐसा दिन है जबकि देवता भी स्नान के लिए पृथ्वी पर आते हैं।

इस दिन पुष्कर, प्रयाग और अन्य तीर्थों में स्नान से कष्टों से मुक्ति मिलती है और आत्मा की शांति प्राप्त होती है। यह माना जाता है कि माघ पूर्णिमा पर भगवान विष्णु गंगाजल में निवास करते हैं इसलिए इस समय गंगाजल के स्पर्श मात्र से उद्धार होता है। इस दिन संगम के जल में स्नान का एक कारण यह भी है कि इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से शोभायमान होते हैं।

पूर्ण चंद्रमा अमृत वर्षा करते हैं। मान्यता है कि माघ पूर्णिमा पर स्नान और दान करने से सूर्य और चंद्र दोषों से मुक्ति मिलती है। माघ के महीने में स्नान के पीछे वैज्ञानिक दृष्टि भी है, चूंकि इस समय ठंड समाप्ति की ओर रहती है और वसंत से ग्रीष्म का आगमन होने लगता है तो इस संधि पर सुबह जल्दी स्नान व्यक्ति को निरोगी बनाता है।

Friday, January 30, 2015

Quiver of these organs is considered auspicious

समुद्रशास्त्र के अनुसार हमारे शरीर के विभिन्न अंगों के फड़कने के कई कारण होते हैं। किसी अंग के फड़कने से शुभ समाचार की प्राप्ति होती है, तो किसी अंग का फड़कना अशुभ माना जाता है।

वैसे तो हमारे शरीर के दाहिने अंग के फड़कने को शुभ और बाएं अंग को अशु माना जाता है। लेकिन महिलाओं के लिए यह विपरीत है। महिलाओं के बाएं अंग का फड़कना शुभ माना जाता है।

यदि आपके दाहिने पैर की पिंडली फड़क रही है तो आपको अचानक कहीं से पैसे मिलने की संभावना बनी रहती है। वहीं अगर आपका होंठ का बायां कोना फड़क रहा है तो किसी प्रिय वस्तु के खो जाने का संकेत है।

अगर आपका ऊपर वाला होंठ फड़क रहा है तो आपको कुछ ही दिनों में भोजन संबंधी प्रिय वस्तु मिलने के योग बन रहे हैं। वहीं अगर होंठ का बायां कोना फड़क रहा है तो प्रिय वस्तु के खो जाने के योग बनेंगे। निचले होंठ का फड़कना जीवन साथी या प्रेमी या प्रेमिका से सुख और पैसों का सुख मिलने का इशारा होता है। होंठ का दाहिना कोना फड़कना आपको मित्रों से अचानक धन लाभ होने का संकेत देता है।

King who had a poor

एक महात्मा रास्ते से कहीं जा रहे थे। वह फटे हुए मैले कपड़े पहने हुए थे। सामने से आ रहे राजा के सिपाही बोले, रास्ते से हट जाओ। राजा साहब आ रहे हैं।

इतने में राजा साहब आ गए। महात्मा आगे बढ़े और राजा से पूछ बैठे, राजा जिसे चाहे अपने देश से निकाल सकता है, ऐसा है क्या ? तब तो बहुत अच्छा है... महात्मा ने आगे कहा कि, मुझे रात को मच्छर काटते हैं, सांप का भय सताता है। राजाजी आप हुक्म दो कि हमारे देश में सांप नहीं रहें।

तब राजा ने कहा कि, हम इनको नहीं निकाल सकते, आप हमारे महल में रह सकते हैं। राजा के आमंत्रण पर महात्मा जी एक दिन महल गए। देखा कि महल के दरवाजे पर बंदूकधारी पहरेदार तैनात हैं।

वह मन ही मन सोचने लगे कि यह महल है या तहखाना। तब राजा ने महात्मा को झरोखे से देख लिया। महात्मा जी का स्वागत सत्कार किया गया।

शाम के समय राजा, महात्माजी के नजदीक के कमरे में खड़े होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि, हे भगवान, मुझे धन दो, आयु दो, राज्य बढ़ाओ।

Tuesday, January 27, 2015

12 राशियों की तारणहार हैं नवदुर्गा

ज्योतिष शास्त्र में राशियों के अनुसार माता के रूपों की पूजा का प्रावधान है। यदि व्यक्ति अपनी राशि अनुसार मां दुर्गा के रूपों की पूजा करे तो उसे शीघ्र ही शुभ फल प्राप्त होता है।

इस तरह करें राशि अनुसार पूजा

    मेष: इस राशि के लोगों को स्कंद माता की विशेष उपासना करनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। स्कंदमाता करुणामयी हैं, जो वात्सल्यता का भाव रखती हैं।

    वृषभ: वृषभ राशि के लोगों को महागौरी स्वरूप की उपासना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। ललिता सहस्र नाम का पाठ करें। अविवाहित कन्याओं को आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

    मिथुन: इस राशि के लोगों को देवी-यंत्र स्थापित कर ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए। साथ ही तारा कवच का रोज पाठ करें। मां ब्रह्मचारिणी ज्ञान प्रदाता, विद्या के अवरोध दूर करती हैं।

    कर्क: कर्क राशि के लोगों को शैलपुत्री की पूजा-उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें। भगवती की वरद मुद्रा अभय दान प्रदान करती हैं।

    सिंह: सिंह राशि के लिए मां कूष्मांडा की साधना विशेष फल करने वाली है। दुर्गा मंत्रों का जाप करें। ऐसा माना जाता है कि देवी मां के हास्य मात्र से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई।

Source:  Horoscope 2015

Tuesday, January 13, 2015

'संगम' तट पर बन रहा 13 वर्ष बाद यह दुर्लभ योग

तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती के 'संगम' तट पर लगे माघ मेले में कुंभ जैसे गृह योग बना रहा है। माघ मेले के महत्व में खासा इजाफा करेगा।

जानकारों का कहना है कि इसके चलते माघ मेले में कुंभ मेले का पुण्य कमाया जा सकता है। यह स्थिति पूरे एक माह तक रहेगी। इस दौरान संगम में स्नान, जप, तप व व्रत आदि अनुष्ठान कई गुना पुण्य देने वाले साबित होंगे। बारह वर्षीय कुंभ हो या हर साल आयोजित होने वाला माघ मेला, इनकी स्थिति सूर्य और गुरु की चाल पर ही निर्भर होती है।

मकर राशि में सूर्य के प्रवेश करने पर ही संक्रांति का विशेष स्नान होता है। उस समय सूर्य उत्तरायण भी हो जाता है। इस बार सूर्य का मकर में प्रवेश 14 जनवरी को हो रहा है, जबकि गुरु पिछले जून से ही अपनी उच्च राशि कर्क में विचरण कर रहा है।

तारीख एक त्योहार अनेक

जनवरी की 14 तारीख के पहले और बाद में देश भर में अलग-अलग नामों से सूर्य की उपासना के पर्व मनाए जाते हैं। असम में जहां बिहू का उत्सव रहता है तो तमिलनाड़ू में पोंगल का। पंजाब में लोड़ी का तो समूचे उत्तर भारत में मकर संक्रांति का हर्षोल्लास छाया रहता है।

बिहू

बिहू असम में मनाया जाने वाला एक पर्व है। असम के सभी लोग जाति-पांति, ऊंच–नीच एवं सम्प्रदाय आदि के भेदभावों को भूलकर बड़े उत्साह से बिहू पर्व को मनाते हैं।असम के हरे–भरे व वर्षा से तृप्त मैदानी भागों में वस्तुतः तीन बिहू मनाए जाते हैं, जो कि तीन ऋतुओं के प्रतीक हैं।

इस त्योहार के मनाने से हमें अपने प्राचीन धर्म की महानता के दर्शन करने की एक नयी दृष्टि मिलती है। यह पर्व नृत्य–संगीत के माध्यम से मानव मन, विशेषकर युवा, युवतियों के लिए तो बहुत ही खुशी का पर्व होता है।

असम में मनाए जाने वाले बिहू के तीन रूप हैं। पहला बिहू जिसे 'बोहागबिहू या रंगोली बिहू' कहते हैं अप्रैल में चैत्र या बैसाख के संक्रमण काल में मनाया जाता है। यह असम का मुख्य पर्व है।

जानिए पतंग का पौराणिक संबंध

देश के लगभग सभी राज्यों में मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की परंपरा है। तुलसी दास जी ने रामचरितमानस में भगवान श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भगवान श्री राम ने भी पतंग उड़ायी थी। इसलिए इस परंपरा का संबंध त्रेतायुग में भगवान श्री राम से जुड़ा हुआ है।

श्रीरामचितमानस में लिखा है कि, 'राम इक दिन चंग उड़ाई। इंद्रलोक में पहुंची जाई।।' तमिल की तन्दनानरामायण के अनुसार मकर संक्रांति ही वह पावन दिन था जब भगवान श्री राम और हनुमान जी की मित्रता हुई। मकर संक्राति के दिन राम ने जब पतंग उड़ाई तो वह पतंग इन्द्रलोक में पहुंच गई।

पतंग को देखकर इन्द्र के पुत्र जयंती की पत्नी सोचने लगी कि, जिसकी पतंग इतनी सुन्दर है वह स्वयं कितना सुंदर होगा। भगवान राम को देखने की इच्छा के कारण जयंती की पत्नी ने पतंग की डोर तोड़कर पतंग अपने पास रख ली।

वर्ष में एक बार इस दिन सूर्य जाते हैं पुत्र शनिदेव के घर

मकर संक्रांति के दिन भगवान भास्कर (सूर्य) अपने पुत्र शनिदेव से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अतएव इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चयन किया था।

मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मकर-संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है। इस दिन लोग पतंग भी उड़ाते हैं जोकि उन्मुक्त आकाश में उड़ती पतंगें देखकर स्वतंत्रता का अहसास होता है।

महापर्व एक रूप अनेक

हमारे वेदों में मकर संक्रांति को महापर्व का दर्जा दिया गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाकर खाने और खिचड़ी से बने पकवान दान करने की प्रथा होने से यह पर्व खिचड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गया है। झारखंड और मिथिलांचल के लोगों का मानना है कि मकर संक्रांति से सूर्य का स्वरूप तिल-तिल बढ़ता है, अतः वहां इसे तिल संक्रांति कहा जाता है।

आगामी 100 साल तक 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति

मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। आगामी 100 साल तक 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाई जाएगी।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 14 जनवरी माघ कृष्ण पक्ष नवमीं बुधवार की रात में दशमी तिथि लगने के बाद स्वाति नक्षत्र में दोपहर 1.23 बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगा।

चूंकि संक्रांति का विशेष पुण्यकाल ब्रह्ममुहूर्त और सूर्य दर्शन का पर्व है, इसलिए यह पर्व दूसरे दिन 15 जनवरी को मनाया जाएगा। ज्योतिष मठ संस्थान के संचालक पं. विनोद गौतम के अनुसार संक्रांति का पुण्यकाल 16 घंटे रहता है। गौरतलब है कि हर सौ साल में एक दिन संक्रांति बढ़ती है।

पं. गौतम के अनुसार निर्णय राशियों के एक दिन पीछे चले जाने से हर 100 साल में संक्रांति का एक दिन बढ़ जाता है। पं. गौतम ने बताया कि चूंकि सूर्यास्त के बाद मकर संक्रांति आती है तथा धर्मशास्त्रों में रात्रि में नदी, तालाबों में स्नान वर्जित है ऐसे में दूसरे दिन 15 जनवरी को संक्रांति का पुण्यकाल रहेगा।

मकर राशि में जब सूर्य आते हैं तो इनमें देवता नाग, गंधर्व, किन्नर, ऋषिमुनि, संत आदि घाटों पर स्नान करते हैं। रामचरित मानस में भी संक्रांति पर्व का महत्व बताया गया है। इस दिन स्नान से मनुष्य शारीरिक व मानसिक रोगों से मुक्त होता है।

Source: Horoscope 2015

Thursday, January 8, 2015

Struggle to pass the bill would Pandit Shrine

वादी में पंडितों की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक सैकड़ों मंदिरों व धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे संगठन प्रेमनाथ भट्ट मेमोरियल ट्रस्ट ने कश्मीरी हिंदू श्राइन बिल को पारित करवाने के लिए नई रणनीति तय की है।
ट्रस्ट ने जम्मू में पंडितों के विभिन्न संगठनों के नेताओं की बैठक को बुलाकर इस बात का फैसला किया है कि राज्य में चुनावों के चलते कश्मीरी हिंदू श्राइन बिल को पारित करवाने के लिए पंडितों का संघर्ष कुछ धीमा पड़ गया था लेकिन अब आने वाले दिनों में सरकार के गठन के साथ बंधी उम्मीद के चलते पंडितों ने भी अपनी रणनीति नए सिरे से बनाई गई है। ट्रस्ट के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए उनकी आस्था के प्रतीक धार्मिक स्थलों का संरक्षण आवश्यक है। 

वहीं, संगठन के वरिष्ठ नेता हीरा लाल भट्ट ने सभी नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कश्मीरी ंिहंदू श्राइन बिल को पारित करवाने के लिए पंडितों में वैसा ही उत्साह है जैसा कि पहले हुआ करता था। पंडित नई सरकार के सत्ता में आने के साथ ही बिल पारित करवाने के लिए अपने संघर्ष को तेज करेंगे। 

Friday, January 2, 2015

Unique festival in the world

दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्मों के तीन सबसे बड़े त्योहार दिवाली, क्रिसमस और ईद हैं। जो दुनिया भर में बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। लेकिन दुनिया में ऐसे और भी त्योहार हैं जो बिल्कुल अनोखे हैं। इन्हीं त्योहारों में से कुछ इस तरह हैं...

हड़ाका मसूरी

जापान का साइदाजी क्षेत्र जहां 'हड़ाका मसूरी' नाम का अनोखा त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार इसलिए अनोखा है क्योंकि इस त्योहार के दौरान लोग बिना वस्त्र के रहते हैं। यह 21 फरवरी को मनाया जाता है।

कहते हैं इस त्योहार पर जापानी पुरुष अपने आपको शुद्ध करने के लिए कपड़े त्याग देते हैं ये सड़कों पर आते हैं और 'वशोई' नामक शब्द को जोर-जोर से चिल्लाते हैं जिसका अर्थ होता है 'शानदार'। आधी रात के बाद स्थानीय पूजा घर से शिंगी नामक लकड़ी के टुकड़े फेंके जाते हैं, जो लोग इन्हें प्राप्त कर लेते हैं वह अपने आपको बहुत ही शुभ मानते हैं।

ऑरेंज फेस्टिवल

इटली के इवरिया इलाके में ऑरेंज फेस्टिवल या संतरा त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार 25-28 फरवरी के बीच मनाए जाने वाले इस त्योहार के दौरान लोग सेना का रूप रखकर में खड़े होकर संतरे फेंकते हैं।

इस त्योहार के पीछे एक रोचक कहानी हैं अगर संक्षेप में कहें तो 12 वीं सदी में यहां की युवा लड़कियों को शाही सैनिक उठा ले जाते थे। इस बात का विरोध करने के लिए यहां के लोगों ने जनआंदोलन किया और विजय प्राप्त की। यह त्योहार तभी से मनाया जाने लगा।

बंदरों को खाना खिलाना

हर वर्ष 25 नवम्बर को थाईलैंड के लोबतुरी प्रांत के प्रा प्रांग साम योट मंदिर में बंदरों को खाना खिलाया जाता है। थाईलैंड के लोग इस त्योहार के जरिए भगवान श्री राम को श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। उनका मानना है कि बंदरों को खाना खिलाने हनुमानजी प्रसन्न हो जाते हैं।

चीज़ ( मक्खन) का त्योहार

यह त्योहार मई के आखिरी सोमवार के दिन इंग्लैंड के ग्लोस्टरशायर क्षेत्र की कूपर्स हिल पर मनाया जाता है। इस दि 5 तरह की दौड़ आयोजित की जाती है। जो जीतता है उसे परंपरागत तौर पर एक ग्लूस्टर डबल चीज दी जाती है। दौड़ प्रतियोगिता में छोटे पहाड़ों पर चड़ना होता है।

इस दौरान रास्ते में चीज बिछाई जाती है जिसके चलते और काफी फिसलन हो जाती है। कई लोग गिरते हैं चोट आती है लेकिन लोगों का उत्साह कम नहीं होता है।

ला टोमटिया

अगस्त के आखिरी बुधवार के दिन स्पेन के ब्यूनोन में टमाटर उत्सव मनाते हैं हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरते हैं और एक दूसरे पर टमाटर फेंकना शूरु करते हैं लोगों के बीच युद्ध करते हैं और कपड़े तक फाड़ दिए जाते हैं।

बैल से संघर्ष

स्पेन का एक और विचित्र त्योहार हपेम्प्लोन शहर में जुला 07 से 14 के बीच यह त्योहार मनाया जाता है। लोग बैलों के आगे दोड़ लगाता हैं और उन्हें बुल रिंग में लाने का प्रयत्न करते हैं।

यह दूरी करीब 800 मीटर की होती है। और परी प्रक्रिया 2-3 मिनट में समाप्त हो जानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता इस बीच बैल रास्ते में ही भड़क जाते हैं और लोगों पर हमला करे देते हैं।

memories of konark temple in heaven

जम्मू और कश्मीर के ऊधमपुर जिले के पहाड़ वास्तुकला के नायाब नमूनों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं, और यहां है क्रिमची मंदिर जिसे पांडव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर अपने स्थापत्य कला के जरिए कोणार्क के सूर्य मंदिर की झलक दिखलाता है।

आमतौर पर इन्हें पांडव मंदिर के नाम से जाना जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का बोर्ड भी इस बात का सत्यापन करता है कि पांच बड़े और दो छोटे मंदिरों का यह समूह पांडव मंदिरों के नाम से प्रसिद्ध है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 'यह राजा कीचक की नगरी हुआ करती थी, जहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान का कुछ समय व्यतीत किया था। इनके निर्माण 8वीं-9वीं शताब्दी में हुआ है।

कहते हैं ये सभी मंदिर एक ही रात में बनाए गए, लेकिन इन मंदिरों को देखकर इसे दंतकथा ही कहा जा सकता है।

इस मंदिर की समृद्ध वास्तुकला अपने आप में अनूठी है। नागर शैली के इन मंदिरों की शक्ल बहुत हद तक कोणार्क के मंदिरों से मिलती है। क्रिमची के मंदिर जम्मू संभाग के ऊधमपुर जिले के क्रिमची गांव में स्थित हैं।

यदि सड़क मार्ग से आते हैं, तो ऊधमपुर पहुंचने से तकरीबन छह किलोमीटर पहले ही बाईं ओर क्रिमची की ओर जाने का रास्ता है। यदि आप ऊधमपुर तक रेल मार्ग से पहुंचते हैं, तो रेलवे स्टेशन सतकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर दाहिनी ओर क्रिमची के लिए मुड़ना होगा।