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Sunday, December 21, 2014

Is the center of your life ...

आप सब छोड़ सकते हैं, पर अपनी पहचान को नहीं, अपनी बुद्धि को नहीं छोड़ सकते। अपने प्रेम को नहीं छोड़ सकते, अपनी अभिव्यक्ति को नहीं छोड़ सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह तुम्हारी अपनी दुनिया है। इसे आपने मान लिया है, पर यह भी सत्य है कि यह आपकी बाहर की यात्रा है।

आप किनारे की ओर जा रहे हैं। उस किनारे पहुंचकर आप लौटना चाहें भी तो नहीं लौट सकेंगे। एक यात्रा है, जो बाहर की यात्रा है, दुनियादारी की यात्रा है, भोग की यात्रा है। यह आपकी अधोगामी यात्रा है। आप अपने केंद्र से अधोगामी हो गए हैं। आपकी जाग्रति तो हुई है, पर आप जाग कर अपनी सीमा की ओर नहीं जा रहे हैं। आपकी सीमा उध्र्वगमन की अंतिम यात्रा में है। आपकी सीमा मस्तिष्क के केंद्र में है। आपका केंद्र ऊपर मस्तिष्क में है और आपकी शक्ति मूलाधार चक्र के निकट है। इसलिए आप दो दिशाओं में बंटें हों। उन दो दिशाओं के दो लक्ष्य हंै। एक भीतर की ओर की दिशा, जो आपको जाग्रत करती है। यह आत्म-बोध का जागरण है। यह स्वयं की अंतर्यात्रा है, जिसकी सीमा ही आप हो। एक बाहर की ओर की दिशा, जहां आप जा रहे हो, जिसे आपने स्वीकार कर लिया है। यह भोग की यात्रा है। यह निर्माण की यात्रा है। यह वह किनारा है जहां समन्वय है, संबंध है, संपर्क है, पहचान है।

यहां आप उस स्थिति में होते हो, जहां भोग ही भोग है। पशु और आपमें कोई अंतर नहीं है। इस यात्रा में आपकी वृत्ति पशुवत होती है। पेड़ पौधे की तरह का जीवन, पर यह अन्य जीवों की अंतिम यात्रा है। यह पशु पक्षियों के जीवन की अंतिम सीमा है, पर यह आपकी पहली सीढ़ी है। यह आपकी प्रथम सीमा है। पहला जागरण है। आप में और पशु में कोई अंतर नहीं है। उस धरातल पर खड़े होकर आप भी पशु हो जाते हैं। यह अधोगमन की यात्रा है। यह भोग की यात्रा है। आपके लिए एक दूसरी यात्रा भी है, जो बुद्धि के पार जाती है, जहां बुद्धि सीमा नहीं है, बुद्धि छोर नहीं है। बुद्धि के बाद ही आपकी चेतना है, परमात्मा है। परमात्मा के तल पर जाकर फिर आप, आप नहीं होते हो। तब आप परमात्मामय हो जाते हो, आत्ममय हो जाते हो। तो यह है आपका जागरण। यह है आपकी दो दिशाओं की जाग्रति और इसी के बीच में आपकी शक्ति और आधार है। यही आपके जीवन का केंद्र है।

Monday, December 8, 2014

What's devotion

भक्ति में बहुत शक्ति होती है। भक्ति का तात्पर्य है-स्वयं के अंतस को ईश्वर के साथ जोड़ देना। जुडऩे की प्रवृत्ति ही भक्ति है। दुनियादारी के रिश्तों में जुट जाना भक्ति नहीं है। भक्ति का मतलब है पूर्ण समर्पण। सरल शब्दों में हम कहते हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा की डोर से बंध गई। ईश्वर के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पित होने वाला स'चा साधक ही भक्त है।

जिसके विचारों में शुचिता (पवित्रता) हो, जो अहंकार से दूर हो, जो किसी वर्ग-विशेष में न बंधा हो, जो सबके प्रति सम भाव वाला हो, सदा सेवा भाव मन में रखता हो, ऐसे व्यक्ति विशेष को हम भक्त का दर्जा दे सकते हैं। नर सेवा में नारायण सेवा की अनुभूति होने लगे, ऐसी अनुभूति ही स'ची भक्ति कहलाती है। भक्त के लिए समस्त सृष्टि प्रभुमय होती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-जो पुरुष आकांक्षा से रहित, पवित्र, दक्ष और पक्षपातरहित है, वह सुखों का त्यागी मेरा भक्त मुझे प्रिय है, परंतु अफसोस यह कि इस दौड़ती-भागती और तनावभरी जिंदगी में हम कई बार प्रार्थना में भगवान से भगवान को नहीं मांगते, बल्कि भोग-विलास के कुछ संसाधनों से ही तृप्त हो जाते हैं।

जब व्यक्ति दुनियादारी से दूर हटकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित करता है, तभी उसकी चेतना झंकृत होती है और परमात्म चिंतन में ईश्वरीय भक्ति साकार होने लगती है। भक्ति थी मीरा की, भक्ति थी चैतन्य महाप्रभु की, बुद्ध की, नानक की और महावीर की। जब सब लोग रात में सो जाएं और उस समय भी जिसके मन में परमपिता को पाने की हुंकार उठे, तो समङों वही स'चा भक्त है। भक्त सही मायने में सुख और आनंद का पर्याय है। जब आपकी कामना या प्रार्थना राममय हो जाए, तो समङों कि यही भक्ति है। भक्त ही एकमात्र ऐसा है जो हृदय से यदि भगवान को याद करे तो परमपिता भी स्वयं को उसके अधीन कर देते हैं।

इसलिए कहा भी गया है कि स'ची भक्ति से भगवान भी भक्त के वश में हो जाते हैं। भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। भगवान राम ने शबरी के झूठे किए बेर भी प्रेम और भक्तिभाव के कारण खाए थे। मन में भक्ति भाव के उठने के बाद भक्त के व्यक्तित्व के नकारात्मक गुण दूर हो जाते हैं और उसके व्यक्तित्व का उन्नयन होने लगता है। भक्त अहंकार से मुक्त होकर अपनी अंतस चेतना में ईश्वर की अनुभूति करने लगता है। 

Saturday, December 6, 2014

Use positive power

भारत में शक्ति का महत्व आदिकाल से ही माना गया है। चाहे धर्म हो, अर्थ हो, काम हो और चाहे मोक्ष हो, इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्त शक्ति के बिना संभव नहीं। शक्तिहीन पुरुष या राष्ट्र न अपनी न अपने सम्मान की रक्षा कर सकता है और न कोई उन्नति कर सकता है।

कमजोरी के क्षणों में ही मनुष्य संयम खोता है, पाप करता है और असफल होकर संताप करता है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार जिस समय मनुष्य में बल होता है तभी वह कर्म करता है, दृष्टा और श्रोता होता है। बल से पृथ्वी, अंतरिक्ष, आकाश, पर्वत, देव और मनुष्य संचालित होते हैं। सौ विज्ञानवानों को एक बलवान कंपायमान कर देता है। इसलिए तुम बल की उपासना करो। एक अन्य उपनिषद के अनुसार बलहीन व प्रमादी व्यक्ति आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता।

पशुओं की भांति हमें भी कुछ शक्तियां स्वाभाविक रूप से प्राप्त हैं, परंतु मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक बल के बगैर उनसे अधिक लाभ नहीं होता। इसलिए व्यायाम द्वारा, अध्ययन व मनन द्वारा बौद्धिक व मानसिक और ध्यान के जरिये दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मिक बल का विकास कर मनुष्य दुर्लभ लौकिक और अलौकिक उपलब्धियां प्राप्त करता है। यह शक्ति सत्व, राजस और तामस तीन प्रकार की होती है। सत्व से ज्ञान, भक्ति, साधना, राजस से निर्माण और कर्म और तामस शक्ति से विध्वंस होता है। इसलिए हमें तामस शक्ति की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। शक्ति का सकारात्मक प्रयोग ही अच्छा होता है। शक्ति की साधना सर्वप्रथम हम ऋग्वेद की एक ऋचा में पाते हैं जिसमें शक्ति की अधिष्ठात्री देवी कहती हैं कि यह समस्त संसार उन्हीं से उत्पन्न और संचालित है। देश में वर्ष में दो नवरात्र शारदीय और बासंतिक दिनों में सभी शक्ति की ही उपासना करते हैं। भगवान राम ने भी युद्ध से पहले शक्ति की उपासना की थी। दुर्गासप्तशती के अनुसार देवता भी बार-बार शक्ति की ही शरण में जाते हैं। भारत भर में शक्ति के 51 पीठ हमें शक्ति की ही महत्ता की याद दिलाते हैं, परंतु एक दौर में हम शक्ति के महत्व को भूल गए थे, जिसके कारण हम अपना गौरव और ज्ञान-विज्ञान खोकर गुलाम हुए। हम सब मिलकर शक्ति की साधना करें, स्वयं और राष्ट्र को शक्तिशाली बनाएं।1 3रामकुमार शुक्ल