Thursday, July 14, 2016

'स्मार्ट कैंट' में गंदगी से हाहाकार

कुछ दिन पहले ही स्मार्ट कैंट बनाने की बात हो रही थी, लेकिन आरआर मॉल ध्वस्तीकरण मामले में कैंट बोर्ड अफसरों पर मुकदमा दर्ज किए जाने के खिलाफ हड़ताल पर उतरे कर्मचारियों ने क्षेत्र में बुनियादी सेवाएं ठप कर दी। बुधवार को हड़तालियों ने न केवल स्कूल्स व सफाई कार्य ठप किया, बल्कि मेडिकल जैसी इमरजेंसी सेवाओं को भी बंद कर दिया। जबकि मांग पूरी न होने पर पेयजल आपूर्ति पर भी रोक लगाने की बात कही।

बुनियादी सेवाएं प्रभावित

अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस व छावनी परिषद कर्मचारी यूनियन से जुड़े कर्मचारियों ने बुधवार को छावनी क्षेत्र के बुनियादी सेवाएं हिला कर रख दी। हड़ताल के चलते कर्मचारियों ने न तो क्षेत्र का कूड़ा उठाया और न ही और न ही झाडू। जिसका प्रभाव छावनी क्षेत्र में साफ देखने को मिला।

स्कूल रहे बंद

हड़ताल पर उतरे कर्मचारियों ने छावनी क्षेत्र स्थित सीएबी और आधारशिला पब्लिक स्कूल बंद करा दिए। सुबह जब बच्चे स्कूल पहुंचे तो स्कूल बंद उनको वापस लौटाना पड़ा। क्लासेस बिल्कुल खाली दिखाई पड़ी।

भटकते रहे मरीज

हड़तालियों ने इमरजेंसी सेवाओं को भी बख्शा और कैंट हॉस्पिटल को भी बंद करा दिया। हॉस्पिटल के मुख्य द्वारा पर हड़ताल का बैनर लगा कर जनरल ओपीडी बंद करा दी गई। नतीजा यह हुआ कि इलाज की तलाश में मरीज इधर- उधर भटकते रहे।

सड़कों पर पसरा रहा कूड़ा

हड़ताल में शामिल सफाई कर्मचारियों ने कूड़ा उठाने से साफ इंकार कर दिया। बुधवार को न तो सड़कों पर झाडू लगाई गई और न ही कूड़ा उठाया गया। हालत यह हो कूड़े से उठती दुर्गध ने लोगों का रास्तों से गुजरना दूभर कर दिया।

बॉक्स

कैंट ऑफिस में धरना जारी

आरआर मॉल प्रकरण में अफसरों पर मुकदमे के विरोध में बुधवार को कर्मचारियों का धरना जा रहा। अखिल भारतीय सफाई मजदूर कांग्रेस व छावनी परिषद कर्मचारी यूनियन के बैनर तले धरने पर बैठे कर्मचारियों ने कहा कि 210 बी प्रकरण के मुख्य सूत्रधार को न पकड़ना प्रमाणित करता है कि व्यापारियों के साथ पुलिस भी आनंद प्रकाश को बचाने में लगी है। कर्मचारियों ने व्यापारियों ने पुलिस पर एकपक्षीय कार्रवाई का आरोप भी लगाया। धरने की अध्यक्षता पुजेश लोहरे व संचालन नवीन चंद्र पंत ने किया। इस मौके पर विनोद कुमार बैचेन, राजू, दिनेश चौहान, योगेश भगत व जयपाल तोमर आदि मौजूद रहे। 

Source: InextLive Jagran

बीएसपी से छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

चंद महीनों के भीतर होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सूबे के प्रमुख विरोधी दल बहुजन समाज पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है। बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होने का मामला निर्णायक मोड़ पर आ चुका है। सूत्रों के मुताबिक जल्द ही इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग फैसला लेने वाला है। आयोग ने बसपा को विगत 28 जून तक इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा था। बदले हालात में यदि पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा खत्म होने की नौबत आई तो पंजाब में उसे किसी दूसरे सिंबल से चुनाव लड़ना पड़ सकता है।

बार- बार मांगी मोहलत

पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में खाता भी नहीं खोल पाने के बाद बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होने की नौबत आ गयी थी। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा समाप्त करने के लिए आयोग ने बीएसपी को नोटिस भी थमाया था। इसके बाद पार्टी ने पहले दिल्ली और फिर बिहार चुनाव तक के लिए मोहलत मांगी थी, लेकिन दोनों ही राज्यों में पार्टी की परफार्मेस अच्छी नहीं रही और वह इतने वोट नहीं जुटा सकी जिससे उनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बच जाए। सूत्रों की मानें तो केंद्रीय चुनाव आयोग इस बारे में जल्द ही सुनवाई करने वाला है। मालूम हो कि जल्द पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा को खासकर पंजाब और उत्तराखंड में खासी उम्मीदें है। इनमें से उत्तराखंड में ही वह अपने सिंबल पर चुनाव लड़ पाएगी जबकि पंजाब में उसे आयोग द्वारा दिए गये किसी अन्य सिंबल पर चुनाव मैदान में उतरना पड़ेगा।

ये हैं नियम

चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के लिए किसी भी पार्टी को चार प्रदेशों में कम से कम छह फीसद वोट या तीन चौथाई लोकसभा सीटों पर कम से कम दो फीसदी वोट मिलने चाहिए। इसके अलावा चार राज्यों में राज्य पार्टी के तौर पर उसकी मान्यता होनी चाहिए। बिहार चुनाव में बीएसपी को राष्ट्रीय पार्टी बने रहने के लिए आठ परसेंट वोटों की दरकार थी जबकि उसे सिर्फ 2.07 परसेंट वोट ही हासिल हुए।

1997 में टॉप पर, 2014 से पस्त

बसपा को 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिया गया था। उस समय यूपी के अलावा उत्तराखंड, बिहार और दिल्ली में भी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा था। 2014 से बीएसपी का पतन शुरू हुआ। वह लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल सकी उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में भी उसे अपेक्षित सीट नहीं मिली। दिल्ली चुनाव में भी आम आदमी पार्टी के आगे सभी पार्टियां धराशायी हो गयीं। वहीं बिहार चुनाव में भी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली।

तो छिन जाएगा हाथी निशान

राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त पार्टियों को ना सिर्फ पूरे देश में चुनाव लड़ने के लिए एक ही सिंबल मिलता है बल्कि आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त प्रसारण अवधि मिल जाती है। सिंबल्स आर्डर 1968 के तहत अगर बीएसपी का राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा छिनता है तो पूरे देश में एक ही सिंबल पर चुनाव लड़ने का अधिकार भी नहीं रहेगा। ऐसे में बीएसपी उन राज्यों में ही हाथी सिंबल पर चुनाव लड़ पायेगी जहां उसकी मान्यता राज्य की पार्टी के रूप में होगी। 

Source: InextLive Jagran